Friday, 11 June 2010

बेटियां और पेड़

बेटियों और पेड़ों को एक ही दुःख है प्रभु
इन्हें जहाँ भी लगायें वहीँ उग जाते हैं
और जिन्हें ये देते हैं शीतल हवाएं अपनी
वही लोग इन्हें टुकड़े टुकड़े कर जाते हैं

हर पेड़ में भी एक ईश्वर बसता है
और लोगो हर बेटी में होती है एक माँ
दोनों के बिना जग लगता है शमशान
पर बदवक्त दोनों रहती हैं बेजुबान

पेड़ो से मेरे ईश्वर बढती है हरियाली
बेटियों के पैदा होने से चलता है जहान
दोनों के गले पे रहती मर्दों की कुल्हाड़ी
लेकिन मर्दों पर दोनों का ही एहसान है

फल फ़ूल अगर ये ईश्वर कभी न दे पाएं
सर पर अनगिनत इनके तोहमतें आयें
मर्जी से जग इन्हें मन माना सुनाये
मुह बंद कर दोनों सब कुछ सहती जायें

जब भी चली पेड़ो के गले पर कुल्हाड़ी
कुर्सी, मेज, खिड़की गयी कोई संवारी
औरत के ऊपर हर उम्र में सितम है
बेटी, बीबी या बने या बने दादी नानी

न पेड़ मांगें कुछ, न मांगें कभी नारी
दूसरों की खैर ये दोनों मांगें उम्र सारी
बार बार अग्नि परीक्षाओं में भी जलकर
बार बार बने माँ और छांव प्यारी

" धीयाँ ते रुख" पंजाबी कविता का हिंदी अनुवाद

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