Showing posts with label kedarnath. Show all posts
Showing posts with label kedarnath. Show all posts

Sunday, 9 March 2014

कहते हैं नहीं है खुदा अपना भगवान् से जुदा 
"मसीहा" दिल ये कह रहा है आ खुदा फाग खेल लें 

Kahte hain nahin hai khudaa apnaa bhagwaan se judaa 
"Masihaa " di ye hah rahaa aa khudaa faag khel lein 

Shabd Masihaa

फाग

तुम्हारा फाग होगा रंगीन मगर 
मेरे आशियाने पर तो ..खुदा के 
अभी अभी बरसे हैं ..दहकते शोले 
हे ! विकास का ढोल पीटने वालो 
क्या देखा है कभी किसी गरीब की 
कोठरी को जो बनी है नाजायज जमीन पर 
तुम्हारे बड़े बड़े पोस्टरों की छत से 
तुम ..आका तो बन गए हो ...मगर 
कभी नहीं सोचा तुमने 
तुम्हारे वादों पर हाथ काटकर देने वाले 
किस हाल में जिंदगी बसर करते हैं 
जानते हो छत में हैं कितने ही 
उम्मीद के सुराख ...जहाँ से अक्सर 
तेज़ाब बरसता है ..फागुन होगा तुम्हारा 
अगर तुम आ भी गए कभी ..खेलने 
फाग मेरे दरवाजे पर ...सच कहता हूँ 
नाली के पानी में ..अपना खून मिलाकर 
तुमसे फाग ..जरुर खेलूंगा 
और तब तुम्हारी फोटो भी खिंचवाउंगा 
जिसके नीचे लिखूंगा ..लहू से अपने 
हमारे नरक के पालन हार ..श्री श्री श्री 
कामचोर झूठे नेताजी ..तीन बार विजेता 


शब्द मसीहा 

Monday, 12 July 2010

तुम

मेरे दिल में क्या है जो तुम देख पाते
खुदा की कसम तुम न यूँ रूठ पाते

तुम जो गए हो तो दिल है ये सूना
क्यूँ इतनी थी जल्दी कुछ तो बताते

है बेचैन दिल ये , नहीं चैन इसको
करें क्या हम कुछ समझ ही न पाते

तनहाइयों के रंग बड़े ही अज़ब हैं
जुदाई सहें कैसे हमें तू ही बता दे

अब छा गया है मेरे हर सू अँधेरा
खुशियों को तुम बिन कैसे सदा दें

तुम ही हो साज इस जीवन के मेरे
"कादर" कैसे सजें सुर तू ही बता दे

केदारनाथ"कादर"
kedarrcfdelhi.blogspot .com

Sunday, 11 July 2010

तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
ये धरती सुलगती, तेरी रहमत के बिना
तू ही मालिक विधाता, तेरा ही सारा जहां
भूख से मरते क्यूँ तेरे बन्दे, ये बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

तूने ही बख्शी थी,स्वर्ग सी हमको जमीं
गोलियां हैं खून है, रोज़ ही मातम यहाँ
चंद सिक्कों की खातिर, बिका उनका इमां
अब वहां पर नमाजों की जमाते हैं कहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

तेरा कहर ये नाजिल किस तरह हुआ
है कहीं सैलाब, नहीं कहीं कतरा यहाँ
मर गए प्यासे कहीं , कहीं दरिया बना
कर रहा है क्या तू मौला, कुछ तो बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

उजड़े घर यहाँ लाखों, तेरे तूफान से
बन्दे शैतान हो गए तेरे, ईमान से
नन्ही कलियों पर हवस हाबी हुई
बन गया बन्दा तेरा, कैसे हैवान सा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

मंदिर नहीं, मस्जिद नहीं, गिरजा नहीं
अब तेरे गुरुद्वारे भी यहाँ बाकि नहीं
कुदरती काबा भीतेरा अब बिकने लगा
हर जगह पे पसरा जुर्म का साया यहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

जितने भी तेरे रूप हैं सब में तू आ
राम, हजरत,जीसस या नानक बनके आ
जो भी बनना है बनके , जल्दी से आ
तेरे बन्दों का अब तो अकीदा उठ चला
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा

तस्वीर धुधली हो रही रहमत की तेरी
अब लगा न फरियाद तू सुनने में देरी
अब ये जीवन लगने लगा है इक सजा
जल्दी आ जल्दी आ, बस यही इल्तजा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा




केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com





बंजर बढ़ता, बाढ़ है आती, ऐसा भैया जान
आँख पे पट्टी बांधे बैठा, पढ़ा लिखा इन्सान

जंगल काटे, वन घटाए, पैसा खूब कमाए
प्रकृति के आँचल को नोचे, कैसा है हैवान

पर्वत नंगे, नदियाँ प्यासी, सूखा है मैदान
अरे जाग जा भूल मान ले, न बन नादान

बांध बनाकर , तुम गले न नदियों के घोंटो
रुके जल से बढती गर्मी, जानो ये इन्सान

पूरी धरती अपना घर है, बनो न बेईमान
बृक्ष उगें वन बचें , हो नदियों का सम्मान

अभी समय है भूल सुधारो बनो नहीं नादान
"कादर" आँखें बंद रखीं तो होगा बस शमशान


केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com


ये तेरा लालच, ये मेरा लालच
जीवन कितने ही लील गया

न जागे लालच की नींद से
न कर्त्तव्य का ही भान रहा

तुम हो अफसर बैठे AC में
न पदगरिमा का ध्यान रहा

अब कर्मों की खेती में लाशें
देख के मन क्यूँ हैरान रहा

क्या पाया करके ये प्रपंच
क्यूँ अब हाथों को मल रहा

तेरे अपने भी अब हैं फंसे
क्यूँ सोच में मन जल रहा

कितना बड़ा अपराध सोच ले
पैसों की खातिर करता रहा

क्या हासिल हुआ इस चोरी से
"कादर" मन तो तेरा शमशान रहा

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

Wednesday, 7 July 2010

दुःख


मेरे दुःख अपने तुम्ही हो , तुम से ही जीवन सजाया
सुख के पंछी उड़ ही जाते, तुमने ही बंधन निभाया

इस व्यथा से था परिचित, कुछ भी स्थिर नहीं था
इस लिए मेरे प्रिये दुःख , दिल के पालने में बिठाया

तुम रहे जब पास में, मैंने सार्थक मधुमास पाया
तुमने अनुभव कराया, क्या सुखों की होती छाया

मीत हो मेरे ह्रदय के , न तुम्हे मैं त्यज सकूँगा
तेज तेरे ही कारण , मेरे मुख मंडल पे छाया

माना पीड़ा है मगर , तुम से सुख का प्रसव पाया
"कादर" दुःख जिवंत पथ है, करता पगपग उजारा.

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

Wednesday, 30 June 2010

टोपी धारी किन्नर

तुम प्रजातंत्र का नाम लेकर
पीटते रहो ढोल वाह वाही के
और वो तुम्हारे देश में ही
पले कुत्ते , देखें तुम्हे घूरकर
झाग उगलते चीखते चिल्लाते
कहते रहो- देश को माँ भारती
वो तुम्हारा राष्ट्रीयगान नहीं गायेंगे
पोंछेंगे तुम्हारे झंडे से अपने जूते
तुम अहिंसा का राग अलापते हो
अहिंसा कायरो को शोभा नहीं देती
तुम्हे कश्मीर में सरकार चाहिए अपनी
इसलिए बेच दी है भावनाएं देश की
तुम समझौता चाहते हो देशद्रोहियों से
कर साल अरबों रुपये लुटाते हो उनपर
वो तुमपर थूकते हैं, भागते हैं पाकिस्तान
सीखने नए पैंतरे तुम्हे काटने के लिए
तुम्हारे अपने देश के कश्मीरी बच्चे
बिकते हैं सिर्फ दो दो सौ रपये में
मारने को पत्थर तुम्हारे जवानों पर
बैठे रहो सीमाओं पर करते रहो रक्षा
बाहर को देखते हुए अपने दुश्मन
और वो साले लड़ाते रहें तुम्हें
धर्म और इस्लाम के नाम पर
वो इस्लाम का "इ" नहीं जानते
मगर जानते हैं तुम्हारी कमजोरी
जीतकर हारने की तुम्हारी आदत
देखते रहो सपना पूरे कश्मीर का
बिना कुर्वानी कुछ नहीं मिलता
शिखंडी सरकार के नुमाइन्दे सिर्फ
भौंकना जानते हैं, सिपाहियों से घिरे
कभी कुछ बोल भी दिया जोश में
आलाकमान बुलाकर धमका देती है
अरे कुर्सी से चिपके हुए पिस्सुओ
तुम से कुछ नहीं होता तो छोड़ दो
आगे आने दो हिजड़ों को भी
शायद वो ही बचा सकें देश की इज्ज़त
क्योंकि उनके मरने पर कोई नहीं रोता
अपने क्रिया कलापों से तुम ही हो
इस संसद के टोपी धारी किन्नर

केदारनाथ" कादर"
kedarrcfdelhi.blogspot .com

Sunday, 27 June 2010

रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

रोको ये आरी रोको
रोको कुल्हाड़ी रोको
न मारो पांव कुल्हाड़ी पर
तुम काट के अपने पेड़
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

तुम बस दस पेड़ अपना लो
इन्हें अपना मित्र बना लो
तुम काटोगे कभी न पेड़
तुम सब ये सौगंध उठा लो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये पेड़ चुनर धरती की
माँ का न आँचल फाड़ो
ये घर कितने विहगों का
तुम न ये नीड़ उजाड़ो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये रेगिस्तान को रोक रहे हैं
ये मिल सूखा रोक रहे हैं
ये मेरी तुम्हारी सांसों में
अमृत रस घोल रहे हैं
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये शिवशंकर हैं धरती के
co2 विष को पी रहे हैं
मानव अंत की विभीषिका
ये भरसक रोक रहे हैं
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

तुम भी ये नियम अपना लो
इन्हें अपना मित्र बना लो
फल फ़ूल मिलेंगे तुमको
इन्हें जीवन पर्यन्त सम्हालो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये विनय है मेरी सबसे
न अपनी देह यूँ काटो
अंधी विकास की दौड़ में
भूमि न बृक्ष लोथों से पाटो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

फिर न सावन आएगा
फिर न पपीहा गायेगा
आओ "कादर" इन्हें पूजें हम
इन्हें अपना इष्ट बना लो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

केदारनाथ "कादर"kedarrcftkj.blogspot.com

"रोटियां"

मेरे देश के नेताओ
जरा तुम सोच लो
अगर तुम दे न पाओगे
आम आदमी को "रोटियां"
वह भी तुम्हारी थाली को
जीभ लपलपाकर देखेगा
एकटक कुत्ते की तरह
हाँ- यही तो सच है की
भूख बना देती है आदमी को
कुत्ता और आदमखोर
अब तुम सोचो की ये कुत्ता
खा सकता है तुम्हे और
तुम्हारी औलाद को भूख में
इसलिए याद करो अपने वादे
और "कादर" दे दो उसे "रोटियां"
अपनी नस्ल बचाने के लिए

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

"संसद तमाशा

संसद का तमाशा तुम करवाते हो
तुम पलते हो पांच साल तक मुस्टंडे
जो दिखाते हैं संसद में अनाचार
करते हैं दुष्कर्म -तुम्हारी भावनाओं से
तुम्हारे हक़ का हर विधेयक
वेश्यालय की मजबूर रंडी पर
उछाले गए रुपयों की तरह है
जहाँ सरकार तुम्हारी आँख के सामने
एक एक कपडे उतारकर तुम्हारे
खुद को तैयार करती है
तुम्हारे साथ दुष्कर्म करने को
तुमे ही तो चुना है अय्यासी के लिए
जो करेगी तुम्हारे पूरे जीवन काल तक
तुम्हारी अंतर आत्मा का बलात्कार
सदन की बेशर्म कार्यवाही की तरह
तुम्हें चारों खाने चित्त नंगा लिटाकर
तुम्हारे पोर पोर सुख को सोखती है
और तुम बेचारे कुत्ते से , जीभ निकालकर
बस करते हो इंतजार पांच साल
एक नए नेता से बलात्कार का

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

"सूअर -नेता "

मेरा पागल मित्र
नेता शब्द से
और ज्यादा
पगला जाता है
वह सूअरों के
आने पर खुश होकर
गली में नाचता है
वह -कहता है
नेताओं से -सूअर के बच्चे
हैं ज्यादा अच्छे
मेरी गली में आकर
सफाई कर जाते हैं
अपने स्तर की
गन्दगी खाकर
मगर नेता आकर
चुनाव के समय
बस वायदे दिखाता है
सब के सब झूठे
मांगता है भीख
तुम्हारे वोट की
यही कहते हुए
मैं -सूअर से अच्छा हूँ


केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

"संसद-सांसद "

मेरे बच्चे ने पूछा है
बाबा, संसद बला क्या है ?
कैसे समझाउं उसे की ,
ये अज़ब माज़रा क्या है ?

यहाँ हर चोर है महफूज़
हर गुनाहे नापाक करके भी
सुप्रीम कोर्ट भी इनका गुलाम
कभी फांसी इन्हें नहीं मिलती

इनके सब हैं अजब धंधे
नहीं इन्हें व्यापर में मंदे
एक ही चुनाव में जीतकर
करोडपति बनते हैं ये बन्दे

नुमाइंदे ये जनता के
बहुत कहते हैं चिल्लाकर
मगर अपनी जनता बीच
ये सब जाने से डरते हैं

यहाँ आवाम को बेचते हैं
थोक में, पाने को पैसा
ये है बड़े बेशर्मों का जमघट
पर कभी तू लिखना न बच्चे

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

Wednesday, 23 June 2010

माया

खेल अनोखा पागल मन का , बिलकुल समझ न आये
पानी, पानी बिच रहे बुलबुला , काहे ये अलग कहाए

जीवन है क्षणभंगुर ऐसा , पानी के बुलबुले के जैसा
कुछ भी अलग नहीं दोनों में, बात समझ नहीं आये

मूल में आकर मिलना है, भेदन करके रूप नए का
द्वैत मिटाना है अंतर से , यही जीवन लीला कहलाये

मूल से मिल मूल जान ले, अलग नहीं तू सत्य मान ले
अलग अलग का भान ही तेरा, "कादर" माया कहलाये

केदारनाथ" कादर"kedarrcfdelhi.blogspot .com

Monday, 21 June 2010

सदा ए वक़्त

जब तलक फिर से लहू बहाया न जायेगा
मुल्क बरबादियों से बचाया न जायेगा

किससे करें शिकायत, शिकवा, सब हैं चुप
बिन शोर नाखुदाओं को जगाया न जायेगा

माना हैं बिगड़े मुल्क के मेरे हालात दोस्तों
क्या एक नया इन्कलाब लाया न जायेगा

खुदगर्ज़ रहबरों की है बारात मुल्क में
क्या फ़र्ज़ का सलीका सिखाया न जायेगा

जब तक सुकून से नहीं मुल्क का हर शख्स
सोने का फ़र्ज़ "कादर" निभाया न जायेगा

केदारनाथ" कादर"
kedarrcfdelhi.blogspot .com
(published)

Sunday, 20 June 2010

वो कहती है पीता क्यूँ हूँ ?

वो कहती है पीता क्यूँ हूँ ?
दिल कहता है जीता क्यूँ हूँ ?
बंद करो सब भाषण अपने
मेरे मन की बात सुनो
तन मेरा जीवन मेरा है
क्यूँ इन प्रश्नों ने घेरा है ?
घर चाहत का मैंने बनाया
खुशियों से था इसे सजाया
इसमें मन का मीत लाऊंगा
मैं किस्मत से जीत जाऊंगा
पर मुझको मालूम नहीं था
था आकर्षण प्रीत नहीं थी
वह तो केवल एक पथिक थी
वह जीवन की मीत नहीं थी
अब मुझ पर हँसती है जिंदगी
अब मुझको डसती है जिंदगी
वो कहती तू रोता क्यूँ है ?
मरे बक्त को ढोता क्यूँ है ?
मैं यादों में फंसा हुआ हूँ
उन्ही दिनों में बसा हुआ हूँ
दिवास्वप्न बन एक अनोखा
मैं जीवन सपना देख रहा हूँ
पर वास्तव में उनकी नज़र में
उनके दिए दुख भोग रहा हूँ
दुख उन पर भारी न हो ये
इसीलिए मैं मय पीता हूँ
कब से मरा हुआ हूँ "कादर"
जीवन सजा ये भोग रहा हूँ
शायद उन्हें ख़ुशी मिल जाये
इसीलिए मैं मय पीता हूँ
फिर भी प्रश्न यक्ष जैसे हैं
वो कहती है पीता क्यूँ हूँ ?
दिल कहता है जीता क्यूँ हूँ ?

केदारनाथ" कादर"
kedarrcfdelhi .blogspot .com

बदल नहीं सकती

माना हमने दर्द की शाम ये ढल नहीं सकती
जलाकर दिल क्या किस्मत बदल नहीं सकती

वो जो कहते थे अक्सर "बेवफा" मुझको
उनकी क्या आदत ये बदल नहीं सकती

ये बात और है लिखा है किस्मत में डूबना
कोशिशों से क्या इबारत ये बदल नहीं सकती

माना मुश्किल है ठहरना मेरी मौत का यारो
उनके आगोश में क्या मौत ढल नहीं सकती

हमने चाहा है जिसे अपनी रूह की मानिंद
बेवफा "कादर" चुरा नज़रें निकल नहीं सकती

Wednesday, 16 June 2010

हम

बदली छाई है गहरी काली,शाम से
बेकली सी ठहरी दिल में, शाम से

जल गए हैं चिराग घरों में यहाँ
रुक गए हो तुम कहाँ, किस काम से

होते होते शाम दर्द भी है जग गया
जब किसी ने पुकारा तुम्हारे नाम से

ख्याल कोई दिल को सुकूं न दे सका
हम भटकते ही रहे बस नाकाम से

न खुदा से, न कोई मसीहा से उम्मीद
"कादर" अब दोस्ती है गम से, जाम से

केदारनाथ "कादर"

kedarrcftkj.blogspot.com

बारिश

ये प्यार की बारिश, तुम कभी बंद न करना
दर्दमंद दिल बहुत हैं, दरे दिल बंद न करना

उठने दो धुआं दिल से, रहने दो सुलगती आग
आएगा फिर कोई, दरे दिल बंद न करना

हाँ ये भी तो हो सकता है, वो लौट ही आये
उम्मीदों की गली दिल में, कभी तंग न करना

उल्फत का सिला अश्क, सुनते रहे मगर
लूटकर भी "कादर" इश्क में, जिक्र न करना

केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com

जिंदगी

अजीब हवा है चली, रुख किये बगैर
जीना मुहाल हो गया, पल पल मरे बगैर

देखा जो हुस्न रपये का, मेरी जेब में
वो मेरे साथ हो गया, इज़ाज़त लिए बगैर

मांगे से मुहब्बत, नहीं मिलती इस जगह
तुम चाहते हो जिंदगी, कीमत दिए बगैर

मुंसिफ-ए- दौरां भी, हैं उसी के हरम में
यहाँ इंसाफ नहीं मिलता, पैसा दिए बगैर

तुम चाहते हो पनाह, जिंदगी भर दिल में
वो नहीं रहता एक रात, सौदा किये बगैर

अब बदलता बक्त है, "कादर" सीख ले
जीने की आदत, कोई शिकवा किये बगैर


केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com