अजीब हवा है चली, रुख किये बगैर
जीना मुहाल हो गया, पल पल मरे बगैर
देखा जो हुस्न रपये का, मेरी जेब में
वो मेरे साथ हो गया, इज़ाज़त लिए बगैर
मांगे से मुहब्बत, नहीं मिलती इस जगह
तुम चाहते हो जिंदगी, कीमत दिए बगैर
मुंसिफ-ए- दौरां भी, हैं उसी के हरम में
यहाँ इंसाफ नहीं मिलता, पैसा दिए बगैर
तुम चाहते हो पनाह, जिंदगी भर दिल में
वो नहीं रहता एक रात, सौदा किये बगैर
अब बदलता बक्त है, "कादर" सीख ले
जीने की आदत, कोई शिकवा किये बगैर
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
Wednesday, 16 June 2010
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