Friday, 11 June 2010

मेरी तन्हाई

बहुत बेकार सी लगती है, हमको यार तन्हाई
मगर प्यारी लगे है याद में, तेरे बाद तन्हाई
तू नहीं जब साथ होती साथ में होती है तन्हाई
तेरी तस्वीर सी तेरे बाद, मुझे लगती है तन्हाई

हजारों लोग तन्हा हैं, अकेली नहीं मेरी तन्हाई
मगर ये दिल हमेशा तुझे ढूंढता रहता है तन्हाई
कभी तुम पास होते हो, तो भी होती है तन्हाई
अगर तुम दूर होते हो, तो हमें डसती है तन्हाई

तुम्हें चाहकर लगता है दोस्त, जिंदगी है तन्हाई
तन्हाई में तेरी मैं खुद से बातें करने लगता हूँ
कहीं घबरा के खुद से , यार तेरा नाम न ले दूँ
तू जल्दी आ के मिल खाने लगी है तेरी तन्हाई

मुझे मालूम है ए - दोस्त अब तू आ न पायेगी
कफस में कैद है तू मौत की, ऐ मेरी जिंदगी
इसलिए मैं ही चल के दो कदम तुझसे मिलूँगा
मिटेगी इस तरह " कादर" इस दिल की तन्हाई.

केदार नाथ "कादर"
http://kedarrcftkj.blogspot.com

No comments:

Post a Comment

कृप्या प्रतिक्रिया दें, आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्व पूर्ण है इस से संशोधन और उत्साह पाकर हम आपको श्रेष्ठतम सामग्री दे सकेंगे! धन्यवाद -तिलक संपादक