Wednesday, 16 June 2010

हम

बदली छाई है गहरी काली,शाम से
बेकली सी ठहरी दिल में, शाम से

जल गए हैं चिराग घरों में यहाँ
रुक गए हो तुम कहाँ, किस काम से

होते होते शाम दर्द भी है जग गया
जब किसी ने पुकारा तुम्हारे नाम से

ख्याल कोई दिल को सुकूं न दे सका
हम भटकते ही रहे बस नाकाम से

न खुदा से, न कोई मसीहा से उम्मीद
"कादर" अब दोस्ती है गम से, जाम से

केदारनाथ "कादर"

kedarrcftkj.blogspot.com

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