Tuesday, 1 June 2010

कोई

आँखों से कोई देखो
नींदे चुरा गया है
है कोई अजनबी सा
दिल में समां गया है

बातें है पुरकशिश सी
अदाएं है दिल फरेब
कोई जरा सा हंसकर
मन को महका गया है

रखा था जिसको हमने
सबसे अजीज अब तक
आँचल की एक हवा से
दिल को उड़ा गया है

हम दिल पे हाथ रखकर
धुन्ध्ते हैं उस अजनवी को
"कादर" यादों के समंदर में
जो सैलाव उठा गया है

केदारनाथ"कादर"
kedarrcftkj .blogspot .com

No comments:

Post a Comment

कृप्या प्रतिक्रिया दें, आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्व पूर्ण है इस से संशोधन और उत्साह पाकर हम आपको श्रेष्ठतम सामग्री दे सकेंगे! धन्यवाद -तिलक संपादक