आँखों से कोई देखो
नींदे चुरा गया है
है कोई अजनबी सा
दिल में समां गया है
बातें है पुरकशिश सी
अदाएं है दिल फरेब
कोई जरा सा हंसकर
मन को महका गया है
रखा था जिसको हमने
सबसे अजीज अब तक
आँचल की एक हवा से
दिल को उड़ा गया है
हम दिल पे हाथ रखकर
धुन्ध्ते हैं उस अजनवी को
"कादर" यादों के समंदर में
जो सैलाव उठा गया है
केदारनाथ"कादर"
kedarrcftkj .blogspot .com
Tuesday, 1 June 2010
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