जिंदगी तब है, जो नेकी हम करें
डूबने वाले को, जब लेकर हम तरें
जन्म लेते हैं, मरते हैं, सभी हैं जानते
जिंदगी तब है, जब जीते जी मरें
एक दिन मंजिले मौत मिल ही जाएगी
है मजा तब, आज ही राह पर पग धरें
माफ़ हो ही जायेंगी, गुनाहों की सजा
इन्सां हैं, जब बाख़ुशी अपना किया खुद भरें
यूँ तो मरते जीते हैं, लोग कीड़ों की तरह
जीना है, वतन पर जब कोई जीये मरे
माफ़ कर देगा गुनाहों को, " कादर" खुदा
जब किसी के आंसू ,अपनी करनी पर गिरें
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
Wednesday, 16 June 2010
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