परछाईयां हैं उनके मगर नक्से पा नहीं मिलते
अपने में नहीं कोई, भीड़ में खोया शहर
एक रात को छत है मगर घर नहीं मिलते
होटलों में, सभाओं में, ये दिख जायेंगे नेता
इलाके में साहब अपने, कभी पर नहीं मिलते
बैठे हैं कुर्सियों पर अपराधी यहाँ जितने
उतने तो अब जेल के अन्दर नहीं मिलते
मेरी मज़बूरी है "कादर" हाथों में हैं पत्थर
चाहता हूँ मारना, मगर सिर नहीं मिलते
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
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