मैं चाहती थी, तुम छिपे ही रहो,
मैंने तुम्हे सहेजकर रखने की बहुत कोशिश की,
मगर तुम चंचल मेरी जड़ो में छिपे,
यदा कदा झांक ही लेते हो कोशिशो के बाबजूद
मैंने बहुत से रंग उतारे अपने खोल पर
सजाया है अपने अस्तित्व और व्यवहार को
मगर तुमने कुछ आकृतियाँ सजा ही दी हैं
झांकती रहती हैं चहेरे से कोशिशो के बाबजूद
संदेशवाहक तुम हो, मैं जानती हूँ तुम्हे
हर ही ले जाओगे जो है मेरा स्वर्णिम सरमाया
लेकिन मैं भी हूँ नारी, मैं विधि से भी न हारी
सोच से सदा नवयोवना, तुम्हारी दस्तकों के बाबजूद
तुम खीच सकते हो चहेरे पर रेखाएं स्वेत रचनायें
कर सकते हो शक्तिहीन और क्षीण मुझे
लेकिन मैं जियूंगी फिर वैसे ही हँसते हुए
देखकर नया बचपन अपना तुम्हारी कोशिशों के बाबजूद
केदार नाथ " कादर"
Thursday, 7 January 2010
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