लेनी ही होगी अंगड़ाई ,
कब तक यूँ ही सोना है ?
घुट घुट कर कब तक ,
अँधेरे कोने में यूँ रोना है ?
मुश्किल हैं राहें तो क्या ?
हम भी तो लाचार नहीं,
दो कौड़ी का वो न समझें ,
ऐसा कब तक होना है ?
हम सत्ता के स्तम्भ हैं यारो ,
एक हमें अब होना है I
वादों की मीठी गोली खा ,
नहीं हमें अब सोना है I
जगना होगा, उठना होगा,
तभी मिलेगा राज हमें I
महलों पर है हक़ अपना भी,
नहीं गलियारों में सोना है I
मुश्किल हैं राहें तो क्या ?
नहीं अकेले हैं हम भी I
अपने होंसलों के बल से,
हक़ में अपने फैसला होना है I
हम भी हैं इन्सान यही तो ,
आज फैसला होना है I
आज भी मिलकर नहीं लड़े तो,
"कादर" फिर घुटघुट कर रोना है I
केदार नाथ "कादर"
Tuesday, 12 January 2010
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