Tuesday, 12 January 2010

हम भी खुदा

हम पागल हैं या वो बहरे,
असर नहीं क्यूँ होता है ?
प्यार में पागल हर कोई
क्यूँ सौ सौ आँसू रोता है ?

आँसू क्यूँ आतें हैं सोचो ?
सपने धोने की खातिर
बिन सपनोंवाला भी सोचो
क्या कोई इंसा होता है ?

हर एक का सपना लड़ता है
बेबात ही मेरे सपनों से
सपनों को बचाने की खातिर
ग़दर दिलों का होता है

ग़दर गलत है अपनी खातिर
हर कोई ये समझाता है
लड़ी न जिसने जंग कोई भी
वो ही जनरल कहलाता है

हम पागल हैं , हम लडतें हैं
हमनें ही सपने पाले हैं
"कादर" है मतवाला मजनू
खुदा भी हमसा होता है

केदार नाथ "कादर"

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