Monday, 11 January 2010

हत्या

हत्या

मेरा बेटा अख़बार में हत्या शब्द पढ़कर
मुझसे हत्या के मायने पूछ रहा था
पत्नी ने तपाक से एक चांटा जड़कर कहा
पढ़ते तो कुछ हो नहीं और पूछते हो हत्या

मेरा बेटा सहम कर एक ओर चुप हो गया
उसकी जिज्ञासा की पत्नी ने कर दी हत्या
मैं उस समय उसे नहीं समझा सकता था
क्योंकि वह रोज़ ही करती थी ऐसी हत्याएं

हत्याएं केवल शरीर को मारकर नहीं होतीं
किसी के मन को मारना भी हत्या ही है
हम बच्चों की छोटी - छोटी इच्छाओं की
कितनी ही बार करतें हैं हर रोज हत्याएं

हम बड़े होकर अक्सर बनतें ही हैं कसाई
काट डालतें हैं अक्सर मासूम इच्छाओं को
अपनी अच्छे बुरे की सोच की धार से
ज्ञानी और तजुर्बेकार सिद्ध होने के लिये

कितनी ही हत्याएं हम करतें हैं रोज
अपने जीवन में अपने आस पास
नरक बनाते हुए अपने जीवन को
और मिलती है बस एक बार सजा

हमारा जीवन हत्याओं का सिलसिला है
बस सहज स्वीकारोक्ति ही साधन है
इच्छाओं की हत्या से बचने के लिये
एक जीवन पर्याप्त नहीं"कादर"सीखने के लिए


केदार नाथ " कादर"

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