हत्या
मेरा बेटा अख़बार में हत्या शब्द पढ़कर
मुझसे हत्या के मायने पूछ रहा था
पत्नी ने तपाक से एक चांटा जड़कर कहा
पढ़ते तो कुछ हो नहीं और पूछते हो हत्या
मेरा बेटा सहम कर एक ओर चुप हो गया
उसकी जिज्ञासा की पत्नी ने कर दी हत्या
मैं उस समय उसे नहीं समझा सकता था
क्योंकि वह रोज़ ही करती थी ऐसी हत्याएं
हत्याएं केवल शरीर को मारकर नहीं होतीं
किसी के मन को मारना भी हत्या ही है
हम बच्चों की छोटी - छोटी इच्छाओं की
कितनी ही बार करतें हैं हर रोज हत्याएं
हम बड़े होकर अक्सर बनतें ही हैं कसाई
काट डालतें हैं अक्सर मासूम इच्छाओं को
अपनी अच्छे बुरे की सोच की धार से
ज्ञानी और तजुर्बेकार सिद्ध होने के लिये
कितनी ही हत्याएं हम करतें हैं रोज
अपने जीवन में अपने आस पास
नरक बनाते हुए अपने जीवन को
और मिलती है बस एक बार सजा
हमारा जीवन हत्याओं का सिलसिला है
बस सहज स्वीकारोक्ति ही साधन है
इच्छाओं की हत्या से बचने के लिये
एक जीवन पर्याप्त नहीं"कादर"सीखने के लिए
केदार नाथ " कादर"
Monday, 11 January 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment
कृप्या प्रतिक्रिया दें, आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्व पूर्ण है इस से संशोधन और उत्साह पाकर हम आपको श्रेष्ठतम सामग्री दे सकेंगे! धन्यवाद -तिलक संपादक