Thursday, 14 January 2010

मेरी खोज

इस शहर में भीड़ लाखों की मगर , कोई इंसा न मिला
दिल बिछाया लाख राहों में मगर, दोस्त तुमसा न मिला

चलते फिरते पुतले कितने, पर नहीं कोई हमसफ़र
साथ तो चलते रहे वो , पर दोस्त तुमसा न मिला

तुम नहीं थे, गम नहीं था, हम भी मुस्कराते थे कभी
खुद को खोया पाने को तुम्हें, पर दोस्त तुमसा न मिला

आसान राह सूझती कोई नहीं, जितना खोजा उतने खोये
भीगकर मय में भी देखा , पर दोस्त तुमसा न मिला

सोचता हूँ मैं पागल हूँ, या खुद ही में खो गया हूँ
अब ये जाना खोजते "कादर", तू छिपा मुझमें ही मिला

केदार नाथ " कादर"

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