विदेश शिक्षित हिन्दुस्तानी बेटे से बाप ने पूछा-
बेटा बताओ की भगत सिंह कौन था ?
भगत सिंह भगवान् को न माननेवाला ,
आपनी इगो जान से ज्यादा जाननेवाला
दलबदल के बजाय फाँसी चूमनेवाला
हर हिन्दुस्तानी की तरह वक्त से पहले मरा
बाप बेटे के विदेशी ज्ञान पर हतप्रभ था
उसे विदेशों से विशेष शिक्षा दिलवाई थी
बाप हैरान था बेटे ने कैसी शिक्षा पाई थी
क्या बेटे ने गलत पहचान बताई थी ?
हाँ , आज के हालात में शहीदों की यही पहचान है
भगत सिंह "सिख" था या नहीं आज भी सवाल है
उसके मरने पर रोनेवाला कोई पागल देशप्रेमी है
या उसके जैसे किसी शहीद परिवार का सदस्य है
नेताओं को उनके प़ी ए भगतसिंह का जन्मदिन बताते हैं
नेता नौजवानों को आज का भगतसिंह कहकर बह्कातें हैं
अपने हित साधनें के लिए सरकारी संपत्ति उनसे जलवातें हैं
शिक्षित युवाओं को मेहनताना शराब ओ शबाब से दिलवातें हैं
आज वैसा चरित्र जीने की क्षमता न युवाओं में है न नेताओं में
इसलिए भगतसिंह की चर्चा करने से भी नेता लोग घबरातें हैं
हम करोड़ों प्रतियां छाप चुकें हैं, गीता और रामायण की
मगर ऐसे महान वीरों की कर्मगीता लिखने से घबरातें हैं
वे सिर्फ बुत ही अच्छे लगते हैं हम उन्हें माला पहनाते हैं
उनका जन्मदिन मनाने के नाम पर मोटी रकम खाते हैं
मेरा रंग दे बसंती चोले पे कमसिनों का डांस करवाते हैं
वे लहू दे गए देश को हम जाम उठाकर जन्मदिन मनाते हैं
एक विदेशी तालीम याफ्ता बेटा ऐसा जवाब दे मुमकिन है
मगर हम इस देश की माँ का लहू पीकर जीने वाले
देश की मिट्टी के लिए मरनेवालों को अक्सर भूल जातें हैं
मरे हुए जहन के लोग "कादर" जीते जी मरे कहलाते हैं
केदार नाथ " कादर"
Tuesday, 12 January 2010
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