Thursday, 7 January 2010

नया वर्ष

नया वर्ष

कहतें है वो नया वर्ष है, जाने क्या क्या लायेगा ?
आलिशान महलों में देखो छह छह चाँद लगाएगा I

जो सोतें हैं फुटपाथों पर, वापिस गाँव भगाएगा,
लिपा पुता चेहरा दुनिया को,दिल्ली का दिखलायेगा I

अब न होंगें रिक्शेवाले , न होंगी झोपड़ पट्टी,
नाम पे उन्नति के फिर से, नया जुल्म कोई ढाएगा I

लोग आयेंगे और देखेंगे, भरे हुए गंगा के तट,
बहते निर्झर कृष्कायों के , कैसे देश छिपाएगा ?

क्या भर जायेंगे घर खाली, भूखे सभी किसानों के ?
क्या भूखा ललुआ सकूल में, पूरा भोजन पायेगा ?

मिट जायेगा भ्रष्ट्राचार क्या, सत्ता के गलियारों से ?
क्या फिर झूठी कसम कोई न नयायालय में खायेगा ?

क्या न होगी अफसरशाही , क्या सच न रुलाएगा ?
रुचिका जैसी अबोधों का, क्या देह शोषण रुक जायेगा ?

क्या काम मिलेगा हर हाथ को, क्या मजदूर सुखी हो जायेगा ?
बिंध गयी आवाज गले की ,क्या शख्श वह कुछ कह पायेगा ?

उम्मींद पर कायम रहो , यही जुमला ये साल भी दोहराएगा,
जो लडेगा खुद के लिये दुनिया से " कादर" वही जी पायेगा I


केदार नाथ " कादर"

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