नाच रही है अंग्रेजी , जनता को समझ नहीं आती है
धीरे -धीरे कर अंग्रेजी , जनता को खाए जाती है
है लोकतंत्र की ये बांदी, पर रानी बनकर बैठी है
देवर नेताओं संग भाभी, सत्ता में मौज मनाये जाती है
सजती फाईल में अंग्रेजी, नौकर शाहों की अंग्रेजी
चढ़ संविधान की छाती पर, ये नाच नचाये जाती है
ये न जाने आँसू चीखें, बस हथियार चलाये जाती है
बहरे बजमारे लोगों को, रह रहकर बहकाए जाती है
सोच खा गई अंग्रेजी, न भाव रहे न बात रही
धीरे धीरे कर अंग्रेजी, इंसानियत खाए जाती है
कपडे छीने छीनी है शर्म, अब नंगों का राज यहाँ
जो है बची खुची रोटी बोटी, उसको बिखराए जाती है
अंग्रेजी कोई भाषा नहीं , ये सोच की एक बीमारी है
"कादर" भोले भाले जनमानस को, सुरसा सी सताए जाती है
केदार नाथ "कादर"
Thursday, 14 January 2010
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