शर्मनिरपेक्ष नेताओं को समर्पित शर्मनिरपेक्षता तिलक राज रेलन
कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
जो तिरंगा है देश का मेरे, जिसको हमने स्वयं बनाया था;
हिन्दू हित की कटौती करने को, 3 रंगों से वो सजाया था;
जिसकी रक्षा को प्राणों से बड़ा मान, सेना दे देती बलिदान;
उस झण्डे को जलाते जो, और करते हों उसका अपमान;
शर्मनिरपेक्ष बने वोटों के कारण, साथ ऐसों का दिया करते हैं;
मानवता का दम भरते हैं, क्यों फिर भी शर्म नहीं आती?
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष....
कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
वो देश को आग लगाते हैं, हम उनपे खज़ाना लुटाते हैं;
वो खून की नदियाँ बहाते हैं, हम उन्हें बचाने आते हैं;
वो सेना पर गुर्राते हैं, हम सेना को अपराधी बताते हैं;
वो स्वर्ग को नरक बनाते हैं, हम उनका स्वर्ग बसाते हैं;
उनके अपराधों की सजा को,रोक क़े हम दिखलाते हैं;
अपने इस देश द्रोह पर भी, हमको है शर्म नहीं आती!
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...
कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
इन आतंकी व जिहादों पर हम गाँधी के बन्दर बन जाते;
कोई इन पर आँच नहीं आए, हम खून का रंग हैं बतलाते;
(सबके खून का रंग लाल है इनको मत मारो)
अपराधी इन्हें बताने पर, अपराधी का कोई धर्म नहीं होता;
रंग यदि आतंक का है, भगवा रंग बताने में हमको संकोच नहीं होता;
अपराधी को मासूम बताके, राष्ट्र भक्तों को अपराधी;
अपने ऐसे दुष्कर्मों पर, क्यों शर्म नहीं मुझको आती;
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष....
कारनामे घृणित हों कितने भी, शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
47 में उसने जो माँगा वह देकर भी, अब क्या देना बाकि है?
देश के सब संसाधन पर उनका अधिकार, अब भी बाकि है;
टेक्स हमसे लेकर हज उनको करवाते, धर्म यात्रा टेक्स अब भी बाकि है;
पूरे देश के खून से पाला जिस कश्मीर को 60 वर्ष;
थाली में सजा कर उनको अर्पित करना अब भी बाकि है;
फिर भी मैं देश भक्त हूँ, यह कहते शर्म मुझको मगर नहीं आती!
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...
कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
यह तो काले कारनामों का,एक बिंदु ही है दिखलाया;
शर्मनिरपेक्षता के नाम पर कैसे है देश को भरमाया?
यह बतलाना अभी शेष है, अभी हमने कहाँ है बतलाया?
हमारा राष्ट्र वाद और वसुधैव कुटुम्बकम एक ही थे;
फिर ये सेकुलरवाद का मुखौटा क्यों है बनवाया?
क्या है चालबाजी, यह अब भी तुमको समझ नहीं आती ?
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...
कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !! शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
Monday, 20 September 2010
Sunday, 5 September 2010
राष्ट्र मंडल खेल आयोजन और दिल्ली
राष्ट्र मंडल खेल आयोजन और दिल्ली -तिलक राज रेलन आजाद
जानकारी मिली दिल्ली सरकार से,
कभी पढ़ा था हमने किसी अख़बार से,
राष्ट्र मंडल खेलों का आयोजन होगा,
दिल्ली पर 55 हज़ार करोड़ का व्यय होगा!
दिन महीने वर्ष बीत गए उस शुभ घडी की प्रतीक्षा में,
पता नहीं कौन से पाठ पढ़े थे नेताओं ने अपनी शिक्षा में,
दिल्ली का रंग रूप तो इस आयोजन की तैयारी में भी
बदल नहीं पाया, चुक गयी सारी निधी जाने किस भिक्षा में
इतनी राशी मुझे जो मिल जाती
बिजली- पानी, सड़क भी खिल जाती
दिल्ली यूँ भाग्य पर नहीं रोती
इसके ठहाकों से दुनिया हिल जाती
छींका लिखा.....
जानकारी मिली दिल्ली सरकार से,
कभी पढ़ा था हमने किसी अख़बार से,
राष्ट्र मंडल खेलों का आयोजन होगा,
दिल्ली पर 55 हज़ार करोड़ का व्यय होगा!
दिन महीने वर्ष बीत गए उस शुभ घडी की प्रतीक्षा में,
पता नहीं कौन से पाठ पढ़े थे नेताओं ने अपनी शिक्षा में,
दिल्ली का रंग रूप तो इस आयोजन की तैयारी में भी
बदल नहीं पाया, चुक गयी सारी निधी जाने किस भिक्षा में
इतनी राशी मुझे जो मिल जाती
बिजली- पानी, सड़क भी खिल जाती
दिल्ली यूँ भाग्य पर नहीं रोती
इसके ठहाकों से दुनिया हिल जाती
सारा ढांचा बदल के रख देता
दिल्ली दुल्हन बना के रख देता
देखते जिस ग़ली, सड़क की तरफ
नज़ारों पर नज़र फिसल जाती
ऐसा होना तो तब ही संभव था
बईमानी होना जहाँ असंभव था
नेता हो और बईमानी भी न करे?
ऐसा होना ही तो असंभव था!
कैसा वो करार था और कैसा वो समय होगा
देश के यश का वास्ता दिया मगर अपयश होगा
मदमस्त बेखबर से बैठे है सब क्यों 'तिलक'
यश हो अपयश किसी पे इसका असर कहाँ होगा?
सौभाग्य ऐसा नहीं है दिल्ली का
छींका*लिखा पड़ा है बिल्ली का
(छींका -मलाई की हंडिया)
छींका लिखा पड़ा है बिल्ली काछींका लिखा.....
Monday, 12 July 2010
तुम
मेरे दिल में क्या है जो तुम देख पाते
खुदा की कसम तुम न यूँ रूठ पाते
तुम जो गए हो तो दिल है ये सूना
क्यूँ इतनी थी जल्दी कुछ तो बताते
है बेचैन दिल ये , नहीं चैन इसको
करें क्या हम कुछ समझ ही न पाते
तनहाइयों के रंग बड़े ही अज़ब हैं
जुदाई सहें कैसे हमें तू ही बता दे
अब छा गया है मेरे हर सू अँधेरा
खुशियों को तुम बिन कैसे सदा दें
तुम ही हो साज इस जीवन के मेरे
"कादर" कैसे सजें सुर तू ही बता दे
केदारनाथ"कादर"
kedarrcfdelhi.blogspot .com
खुदा की कसम तुम न यूँ रूठ पाते
तुम जो गए हो तो दिल है ये सूना
क्यूँ इतनी थी जल्दी कुछ तो बताते
है बेचैन दिल ये , नहीं चैन इसको
करें क्या हम कुछ समझ ही न पाते
तनहाइयों के रंग बड़े ही अज़ब हैं
जुदाई सहें कैसे हमें तू ही बता दे
अब छा गया है मेरे हर सू अँधेरा
खुशियों को तुम बिन कैसे सदा दें
तुम ही हो साज इस जीवन के मेरे
"कादर" कैसे सजें सुर तू ही बता दे
केदारनाथ"कादर"
kedarrcfdelhi.blogspot .com
Sunday, 11 July 2010
उससे पंजा लड़ाते हैं
आओ खेलें खेल नया हम , उससे पंजा लड़ाते हैं
दर्द को दर्द न समझे हम, दर्द में भी मुस्काते हैं
खून जलाकर रस्ता देखा, हमने उसके आने का,
मेरे इस पागलपन पर लोग, मेरी हंसी उड़ाते हैं
मेरी मुर्दा ख्वाहिशों से और मेरे टूटे सपनों से
बिना इल्म-ए-इश्क किये, दुनिया वाले घबराते हैं
रात अँधेरी आँचल में, दिन का सन्देशा लाई देखो
हिम्मत वाले ही यहाँ पत्थर को मोम बनाते हैं
होश होश जो रटते रहते , सदा होश खो जाते हैं
मनमौजी हैं गर्दिश मैं भी हम तो मौज मानते हैं.
माना खुदा है सबका मालिक हम भी कम तो नहीं
सौ-सौ टुकड़ों में बंटकर हम सौ-सौ रूप दिखाते हैं
माना तूने ही है रचा हमें, तुझसे ही पंजा लड़ाते हैं
तेरे दर्द को दर्द न समझे , दर्द में भी मुस्काते हैं
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
आओ खेलें खेल नया हम , उससे पंजा लड़ाते हैं
दर्द को दर्द न समझे हम, दर्द में भी मुस्काते हैं
खून जलाकर रस्ता देखा, हमने उसके आने का,
मेरे इस पागलपन पर लोग, मेरी हंसी उड़ाते हैं
मेरी मुर्दा ख्वाहिशों से और मेरे टूटे सपनों से
बिना इल्म-ए-इश्क किये, दुनिया वाले घबराते हैं
रात अँधेरी आँचल में, दिन का सन्देशा लाई देखो
हिम्मत वाले ही यहाँ पत्थर को मोम बनाते हैं
होश होश जो रटते रहते , सदा होश खो जाते हैं
मनमौजी हैं गर्दिश मैं भी हम तो मौज मानते हैं.
माना खुदा है सबका मालिक हम भी कम तो नहीं
सौ-सौ टुकड़ों में बंटकर हम सौ-सौ रूप दिखाते हैं
माना तूने ही है रचा हमें, तुझसे ही पंजा लड़ाते हैं
तेरे दर्द को दर्द न समझे , दर्द में भी मुस्काते हैं
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
ये धरती सुलगती, तेरी रहमत के बिना
तू ही मालिक विधाता, तेरा ही सारा जहां
भूख से मरते क्यूँ तेरे बन्दे, ये बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तूने ही बख्शी थी,स्वर्ग सी हमको जमीं
गोलियां हैं खून है, रोज़ ही मातम यहाँ
चंद सिक्कों की खातिर, बिका उनका इमां
अब वहां पर नमाजों की जमाते हैं कहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तेरा कहर ये नाजिल किस तरह हुआ
है कहीं सैलाब, नहीं कहीं कतरा यहाँ
मर गए प्यासे कहीं , कहीं दरिया बना
कर रहा है क्या तू मौला, कुछ तो बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
उजड़े घर यहाँ लाखों, तेरे तूफान से
बन्दे शैतान हो गए तेरे, ईमान से
नन्ही कलियों पर हवस हाबी हुई
बन गया बन्दा तेरा, कैसे हैवान सा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
मंदिर नहीं, मस्जिद नहीं, गिरजा नहीं
अब तेरे गुरुद्वारे भी यहाँ बाकि नहीं
कुदरती काबा भीतेरा अब बिकने लगा
हर जगह पे पसरा जुर्म का साया यहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
जितने भी तेरे रूप हैं सब में तू आ
राम, हजरत,जीसस या नानक बनके आ
जो भी बनना है बनके , जल्दी से आ
तेरे बन्दों का अब तो अकीदा उठ चला
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तस्वीर धुधली हो रही रहमत की तेरी
अब लगा न फरियाद तू सुनने में देरी
अब ये जीवन लगने लगा है इक सजा
जल्दी आ जल्दी आ, बस यही इल्तजा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
ये धरती सुलगती, तेरी रहमत के बिना
तू ही मालिक विधाता, तेरा ही सारा जहां
भूख से मरते क्यूँ तेरे बन्दे, ये बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तूने ही बख्शी थी,स्वर्ग सी हमको जमीं
गोलियां हैं खून है, रोज़ ही मातम यहाँ
चंद सिक्कों की खातिर, बिका उनका इमां
अब वहां पर नमाजों की जमाते हैं कहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तेरा कहर ये नाजिल किस तरह हुआ
है कहीं सैलाब, नहीं कहीं कतरा यहाँ
मर गए प्यासे कहीं , कहीं दरिया बना
कर रहा है क्या तू मौला, कुछ तो बता
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
उजड़े घर यहाँ लाखों, तेरे तूफान से
बन्दे शैतान हो गए तेरे, ईमान से
नन्ही कलियों पर हवस हाबी हुई
बन गया बन्दा तेरा, कैसे हैवान सा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
मंदिर नहीं, मस्जिद नहीं, गिरजा नहीं
अब तेरे गुरुद्वारे भी यहाँ बाकि नहीं
कुदरती काबा भीतेरा अब बिकने लगा
हर जगह पे पसरा जुर्म का साया यहाँ
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
जितने भी तेरे रूप हैं सब में तू आ
राम, हजरत,जीसस या नानक बनके आ
जो भी बनना है बनके , जल्दी से आ
तेरे बन्दों का अब तो अकीदा उठ चला
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
तस्वीर धुधली हो रही रहमत की तेरी
अब लगा न फरियाद तू सुनने में देरी
अब ये जीवन लगने लगा है इक सजा
जल्दी आ जल्दी आ, बस यही इल्तजा
तू बता है कहाँ, है कहाँ तू मेरे खुदा
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
बंजर बढ़ता, बाढ़ है आती, ऐसा भैया जान
आँख पे पट्टी बांधे बैठा, पढ़ा लिखा इन्सान
जंगल काटे, वन घटाए, पैसा खूब कमाए
प्रकृति के आँचल को नोचे, कैसा है हैवान
पर्वत नंगे, नदियाँ प्यासी, सूखा है मैदान
अरे जाग जा भूल मान ले, न बन नादान
बांध बनाकर , तुम गले न नदियों के घोंटो
रुके जल से बढती गर्मी, जानो ये इन्सान
पूरी धरती अपना घर है, बनो न बेईमान
बृक्ष उगें वन बचें , हो नदियों का सम्मान
अभी समय है भूल सुधारो बनो नहीं नादान
"कादर" आँखें बंद रखीं तो होगा बस शमशान
केदारनाथ "कादर"
kedarrcftkj.blogspot.com
आँख पे पट्टी बांधे बैठा, पढ़ा लिखा इन्सान
जंगल काटे, वन घटाए, पैसा खूब कमाए
प्रकृति के आँचल को नोचे, कैसा है हैवान
पर्वत नंगे, नदियाँ प्यासी, सूखा है मैदान
अरे जाग जा भूल मान ले, न बन नादान
बांध बनाकर , तुम गले न नदियों के घोंटो
रुके जल से बढती गर्मी, जानो ये इन्सान
पूरी धरती अपना घर है, बनो न बेईमान
बृक्ष उगें वन बचें , हो नदियों का सम्मान
अभी समय है भूल सुधारो बनो नहीं नादान
"कादर" आँखें बंद रखीं तो होगा बस शमशान
केदारनाथ "कादर"
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ये तेरा लालच, ये मेरा लालच
जीवन कितने ही लील गया
न जागे लालच की नींद से
न कर्त्तव्य का ही भान रहा
तुम हो अफसर बैठे AC में
न पदगरिमा का ध्यान रहा
अब कर्मों की खेती में लाशें
देख के मन क्यूँ हैरान रहा
क्या पाया करके ये प्रपंच
क्यूँ अब हाथों को मल रहा
तेरे अपने भी अब हैं फंसे
क्यूँ सोच में मन जल रहा
कितना बड़ा अपराध सोच ले
पैसों की खातिर करता रहा
क्या हासिल हुआ इस चोरी से
"कादर" मन तो तेरा शमशान रहा
केदारनाथ "कादर"
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जीवन कितने ही लील गया
न जागे लालच की नींद से
न कर्त्तव्य का ही भान रहा
तुम हो अफसर बैठे AC में
न पदगरिमा का ध्यान रहा
अब कर्मों की खेती में लाशें
देख के मन क्यूँ हैरान रहा
क्या पाया करके ये प्रपंच
क्यूँ अब हाथों को मल रहा
तेरे अपने भी अब हैं फंसे
क्यूँ सोच में मन जल रहा
कितना बड़ा अपराध सोच ले
पैसों की खातिर करता रहा
क्या हासिल हुआ इस चोरी से
"कादर" मन तो तेरा शमशान रहा
केदारनाथ "कादर"
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