Wednesday, 30 June 2010

टोपी धारी किन्नर

तुम प्रजातंत्र का नाम लेकर
पीटते रहो ढोल वाह वाही के
और वो तुम्हारे देश में ही
पले कुत्ते , देखें तुम्हे घूरकर
झाग उगलते चीखते चिल्लाते
कहते रहो- देश को माँ भारती
वो तुम्हारा राष्ट्रीयगान नहीं गायेंगे
पोंछेंगे तुम्हारे झंडे से अपने जूते
तुम अहिंसा का राग अलापते हो
अहिंसा कायरो को शोभा नहीं देती
तुम्हे कश्मीर में सरकार चाहिए अपनी
इसलिए बेच दी है भावनाएं देश की
तुम समझौता चाहते हो देशद्रोहियों से
कर साल अरबों रुपये लुटाते हो उनपर
वो तुमपर थूकते हैं, भागते हैं पाकिस्तान
सीखने नए पैंतरे तुम्हे काटने के लिए
तुम्हारे अपने देश के कश्मीरी बच्चे
बिकते हैं सिर्फ दो दो सौ रपये में
मारने को पत्थर तुम्हारे जवानों पर
बैठे रहो सीमाओं पर करते रहो रक्षा
बाहर को देखते हुए अपने दुश्मन
और वो साले लड़ाते रहें तुम्हें
धर्म और इस्लाम के नाम पर
वो इस्लाम का "इ" नहीं जानते
मगर जानते हैं तुम्हारी कमजोरी
जीतकर हारने की तुम्हारी आदत
देखते रहो सपना पूरे कश्मीर का
बिना कुर्वानी कुछ नहीं मिलता
शिखंडी सरकार के नुमाइन्दे सिर्फ
भौंकना जानते हैं, सिपाहियों से घिरे
कभी कुछ बोल भी दिया जोश में
आलाकमान बुलाकर धमका देती है
अरे कुर्सी से चिपके हुए पिस्सुओ
तुम से कुछ नहीं होता तो छोड़ दो
आगे आने दो हिजड़ों को भी
शायद वो ही बचा सकें देश की इज्ज़त
क्योंकि उनके मरने पर कोई नहीं रोता
अपने क्रिया कलापों से तुम ही हो
इस संसद के टोपी धारी किन्नर

केदारनाथ" कादर"
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Sunday, 27 June 2010

रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

रोको ये आरी रोको
रोको कुल्हाड़ी रोको
न मारो पांव कुल्हाड़ी पर
तुम काट के अपने पेड़
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

तुम बस दस पेड़ अपना लो
इन्हें अपना मित्र बना लो
तुम काटोगे कभी न पेड़
तुम सब ये सौगंध उठा लो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये पेड़ चुनर धरती की
माँ का न आँचल फाड़ो
ये घर कितने विहगों का
तुम न ये नीड़ उजाड़ो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये रेगिस्तान को रोक रहे हैं
ये मिल सूखा रोक रहे हैं
ये मेरी तुम्हारी सांसों में
अमृत रस घोल रहे हैं
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये शिवशंकर हैं धरती के
co2 विष को पी रहे हैं
मानव अंत की विभीषिका
ये भरसक रोक रहे हैं
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

तुम भी ये नियम अपना लो
इन्हें अपना मित्र बना लो
फल फ़ूल मिलेंगे तुमको
इन्हें जीवन पर्यन्त सम्हालो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

ये विनय है मेरी सबसे
न अपनी देह यूँ काटो
अंधी विकास की दौड़ में
भूमि न बृक्ष लोथों से पाटो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

फिर न सावन आएगा
फिर न पपीहा गायेगा
आओ "कादर" इन्हें पूजें हम
इन्हें अपना इष्ट बना लो
रोको ये आरी रोको , रोको कुल्हाड़ी रोको

केदारनाथ "कादर"kedarrcftkj.blogspot.com

"रोटियां"

मेरे देश के नेताओ
जरा तुम सोच लो
अगर तुम दे न पाओगे
आम आदमी को "रोटियां"
वह भी तुम्हारी थाली को
जीभ लपलपाकर देखेगा
एकटक कुत्ते की तरह
हाँ- यही तो सच है की
भूख बना देती है आदमी को
कुत्ता और आदमखोर
अब तुम सोचो की ये कुत्ता
खा सकता है तुम्हे और
तुम्हारी औलाद को भूख में
इसलिए याद करो अपने वादे
और "कादर" दे दो उसे "रोटियां"
अपनी नस्ल बचाने के लिए

केदारनाथ "कादर"
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"अंगुलिमाल"

चुनाव जीतने के बाद ही
जनता जान पाई- तातश्री
तुम्हारी वास्तविक औकात
तुम्हारी हवस की लम्बाई
जो हजारों गुना ज्यादा है
तुम्हारे पेट की गहराई से
और लाखों गुना बड़ी है
तुम्हारी खद्दरी जेब से
तुम पिस्सू से चिपके
सत्ता के स्तनों पर
आज दिखे हैं सचमुच
तुम्हारे-भेडिये से नुकीले दांत
तुम सत्ता के लिए हर सफाई
कर देना चाहते हो - चाटकर
खून की एक एक बूंद आदमी से
जिससे आदमी के अस्तित्व पर
आ गया है एक संकट
मगर तुम नेता हो , ठीक है
तुम्हारी ये सोच की
आदमी रहे न रहे जिन्दा
सरकार फिर बने इसलिए
अंगूठों की एक विशाल माला
तुम्हे जीतने को चाहिए

केदारनाथ "कादर"
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"संसद तमाशा

संसद का तमाशा तुम करवाते हो
तुम पलते हो पांच साल तक मुस्टंडे
जो दिखाते हैं संसद में अनाचार
करते हैं दुष्कर्म -तुम्हारी भावनाओं से
तुम्हारे हक़ का हर विधेयक
वेश्यालय की मजबूर रंडी पर
उछाले गए रुपयों की तरह है
जहाँ सरकार तुम्हारी आँख के सामने
एक एक कपडे उतारकर तुम्हारे
खुद को तैयार करती है
तुम्हारे साथ दुष्कर्म करने को
तुमे ही तो चुना है अय्यासी के लिए
जो करेगी तुम्हारे पूरे जीवन काल तक
तुम्हारी अंतर आत्मा का बलात्कार
सदन की बेशर्म कार्यवाही की तरह
तुम्हें चारों खाने चित्त नंगा लिटाकर
तुम्हारे पोर पोर सुख को सोखती है
और तुम बेचारे कुत्ते से , जीभ निकालकर
बस करते हो इंतजार पांच साल
एक नए नेता से बलात्कार का

केदारनाथ "कादर"
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"सूअर -नेता "

मेरा पागल मित्र
नेता शब्द से
और ज्यादा
पगला जाता है
वह सूअरों के
आने पर खुश होकर
गली में नाचता है
वह -कहता है
नेताओं से -सूअर के बच्चे
हैं ज्यादा अच्छे
मेरी गली में आकर
सफाई कर जाते हैं
अपने स्तर की
गन्दगी खाकर
मगर नेता आकर
चुनाव के समय
बस वायदे दिखाता है
सब के सब झूठे
मांगता है भीख
तुम्हारे वोट की
यही कहते हुए
मैं -सूअर से अच्छा हूँ


केदारनाथ "कादर"
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"वोट- नेता "

चुनाव आ रहे हैं छिप जाओ
मत निकलो बाहर रूप लेकर
वह मुस्कुराकर देखेगा -गिद्ध सा
नोचने को रूप की सब बोटियाँ

ताल ठोंककर कहेगा वह
बलात्कार,वीर पुरुषों का काम है
वह नहीं डरेगा, कानून-पुलिस से और
न डरा पाएंगी सामाजिक बेड़ियाँ

सरकारी गुंडे भी भागेंगे उसे देखकर
बचाओ अपनी बहन अपनी बेटियां
कर लो हिफाजत , वोट न देना इन्हें
ये यही करेंगे पहन सत्ता की टोपियाँ

सत्ता की टोपी पहनकर होंगे जवान
निकलेगा जिस्म से इनके-हैवान
बस इन्हें इंतजार है तुम्हारे वोट का
जो खोलेगा रास्ता ये सब करने का

केदारनाथ "कादर"

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