इतना कमजोर नहीं हूँ की चटक जाऊँगा
ठोकरें खाया हुआ दिल हूँ न घबराऊँगा
मुझसे नफरत का कर लाख इजहार मगर
मैं हूँ आदत से मजबूर, मैं तुम्हे चाहूँगा
मुमकिन है बुझने लगे जीवन का चिराग
मेरा वादा है मैं पागल सा तुम्हे चाहूँगा
रोशनी चाहे हो जाये सूरज से जुदा
तुम्हारे बिन जीवन का पल न एक चाहूँगा
कितना चाहते हो करना आजमाइश मेरी
यार का सीना हूँ "कादर" आग से न घबराऊँगा
केदार नाथ "कादर"
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Friday, 26 March 2010
Thursday, 25 March 2010
मिलन
कभी कभी मन में सोचती हूँ कि मैं क्या हूँ ?
तुम्हारी परछाई या तुम्हारी आशाओं का बदन
तुम्हारी जिन्दा मुर्दा इच्छाओं कि कब्रगाह
या तुम्हारे और मेरे देखे हुए सपनों का चमन
जीवन में अनेकों प्रश्न कितने बड़े और टेढ़े
जैसे शांत और भयानक ये नील गगन
बहुत देर तक जोड़े रखा है तुमसे खुद को
अब लगता है कभी कि मैं तुम हो जाऊंगी
बहुत दिनों से ढांप राखी थी जिंदगी क़ी चादर
"कादर" तुमसे मिलने हर दीवार गिराकर आऊँगी
केदार नाथ "कादर"
तुम्हारी परछाई या तुम्हारी आशाओं का बदन
तुम्हारी जिन्दा मुर्दा इच्छाओं कि कब्रगाह
या तुम्हारे और मेरे देखे हुए सपनों का चमन
जीवन में अनेकों प्रश्न कितने बड़े और टेढ़े
जैसे शांत और भयानक ये नील गगन
बहुत देर तक जोड़े रखा है तुमसे खुद को
अब लगता है कभी कि मैं तुम हो जाऊंगी
बहुत दिनों से ढांप राखी थी जिंदगी क़ी चादर
"कादर" तुमसे मिलने हर दीवार गिराकर आऊँगी
केदार नाथ "कादर"
Saturday, 30 January 2010
मन का बसंत
बसंत सब का तो नहीं हो सकता समय के साथ
लेकिन समय अगर अच्छा हो तो बसंत ही होता है
हाँ ये बात और है की ऐसा कभी कभी होता है
इसलिये इश्वर ने भी एक ही बसंत बनाया है
मगर वह प्रभु समझ से परे की चीज़ है
इसलिये मन का बसंत हमेशा के लिए बनाया है
जो किसी बादल के पानी का मोहताज नहीं है
कभी आंसुओं से हरा होता है कभी आंसुओं में डूबता है
बसंत मन का कर सकते हो हमेशा के लिये
अगर दूसरों के आंसू पी सकते हो "कादर" हँसते हुए
लेकिन समय अगर अच्छा हो तो बसंत ही होता है
हाँ ये बात और है की ऐसा कभी कभी होता है
इसलिये इश्वर ने भी एक ही बसंत बनाया है
मगर वह प्रभु समझ से परे की चीज़ है
इसलिये मन का बसंत हमेशा के लिए बनाया है
जो किसी बादल के पानी का मोहताज नहीं है
कभी आंसुओं से हरा होता है कभी आंसुओं में डूबता है
बसंत मन का कर सकते हो हमेशा के लिये
अगर दूसरों के आंसू पी सकते हो "कादर" हँसते हुए
Thursday, 14 January 2010
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