Thursday, 25 March 2010

मिलन

कभी कभी मन में सोचती हूँ कि मैं क्या हूँ ?
तुम्हारी परछाई या तुम्हारी आशाओं का बदन

तुम्हारी जिन्दा मुर्दा इच्छाओं कि कब्रगाह
या तुम्हारे और मेरे देखे हुए सपनों का चमन

जीवन में अनेकों प्रश्न कितने बड़े और टेढ़े
जैसे शांत और भयानक ये नील गगन

बहुत देर तक जोड़े रखा है तुमसे खुद को
अब लगता है कभी कि मैं तुम हो जाऊंगी

बहुत दिनों से ढांप राखी थी जिंदगी क़ी चादर
"कादर" तुमसे मिलने हर दीवार गिराकर आऊँगी

केदार नाथ "कादर"

1 comment:

  1. I was not aware about your blog (man ki baat). I have come to know through the blog aggregator 'Desh Ki Mitti.feedcluster.com. I read the poems written and posted by you which are very near to the truth of the life.
    K.L.Ghai.

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