Monday, 18 March 2013

रहनुमा

अब रहनुमा से न दरकार रख, खुद रहनुमा बन यार तू


ये चमन तेरा है याद रख, "कादर" जान से कर प्यार तू



Nar Pishach

आदर्शों की खाल है, नजर उठाकर देखिये जिस ओर भी


"कादर" उघाड़ना मत खाल , नरों में नरपिशाच छिपे हैं



Saturday, 5 January 2013

स्वामी विवेकानन्द महान।


स्वामी विवेकानन्द महान।
CHICAGO SEP 93 12x18 26 RGB FINAL 00
पैदा हुए थे जिस धरती पर, स्वामी विवेकानन्द महान।जिसका यश गाता रहा ये जहान, है मेरा प्यारा हिन्दोस्तान।
ये मेरा प्यारा देश महान, जन्मे स्वामी विवेकानन्द महान।
*देवी देवता, ऋषि मुनि, व महापुरुषों की कर्मस्थली यह।
ज्ञान विज्ञान, विश्व बंधुत्व, प्रेम शौर्य, मानवीय धर्मक्षेत्र है।
मानव ही नहीं जीव जंतु, व पर्यावरण समन्वय का दे ज्ञान।
इसीलिए था विश्वगुरु, तब इस पर क्यों न करें अभिमान ? 
*ग्रहण लगा था विश्वगुरु को, और मानवता जब थी बन्दी। 
आतताइयों के कृत्यों से जब यह धरा हुई सारी थी गन्दी।
1863 में भारत में जन्मे, राज था अंधकार का व फैला अज्ञान
जब ज्ञान खोजता विश्व था, शिकागो में तब कराई पहचान।
*जब राजा ही करे व्याभिचार, तो जनता हो जाती लाचार।
पहला बन्दर सोता रहता है, देश का दर्द न दूजा सुनता है।
मौनी बाबा सत्य  कहता, आश्वासन के पाखंड दिखाता है। 
तभी हैं ऐसे दुरदिन ये आये, कि सारा देश हुआ परेशान। 
*आओ फिरसे बनाये देश महान, जिसका यश गाये सारा जहान।
हम सोने की चिड़िया ऐसी बनायें, जहाँ कोई न हो परेशान। 
आने वाला कल चमकाने में, हम आज कर जायेंगे बलिदान। 
मेरा भारत, सदा रहा है महानये मेरा प्यारा देश महान,...
जिसका यश गाता रहा ये जहान, है मेरा प्यारा हिन्दोस्तान।
पैदा हुए थे जिस धरती पर, स्वामी विवेकानन्द महान।
है मेरा प्यारा हिन्दोस्तान,  ये मेरा प्यारा देश महान,...
है मेरा प्यारा हिन्दोस्तान,  ये मेरा प्यारा देश महान,...
"अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है | इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे ||"  युगदर्पण

Saturday, 10 November 2012

सार्थक दीपावली सन्देश

सार्थक दीपावली सन्देश: సార్థక దీపావలీ సన్దేశ , ஸார்தக தீபாவலீ ஸந்தேஸ , ಸಾರ್ಥಕ ದೀಪಾವಲೀ ಸನ್ದೇಶ , സാര്ഥക ദീപാവലീ സന്ദേശ ,সার্থক দীপাবলী সন্দেশ, 

...Pl. Like it, join it, share it. Tag 50
युगदर्पण का सार्थक दीपावली सन्देश: सार्थक दिपावली का अर्थ ? 
सार्थक दीपावली सन्देश...Pl. Like it, join it, share it. Tag 50 
युगदर्पण का सार्थक दीपावली सन्देश: सार्थक दिपावली का अर्थ ? 
दशहरा यदि सत्य का असत्य पर विजय का प्रतीक है, तो दीपावली प्रकाश का अन्धकार पर। आइयें, इस के लिये संकल्प लें: भ्रम के जाल को तोड़, अज्ञान के अंधकार को मिटा कर, ज्ञान का प्रकाश फेलाएं। आइये, शर्मनिरपेक्ष मैकालेवादी बिकाऊ मीडिया द्वारा समाज को भटकने से रोकें; जागते रहो, जगाते रहो।। 
यह दीपावली भारतीय जीवन से आतंकवाद, अवसरवाद, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की अमावस में, सत्य का दीपक जला कर धर्म व सत्य का प्रकाश फैलाये तथा भारत को सोने की चिड़िया का खोया वैभव, पुन:प्राप्त हो! अखिल विश्व में फैले सम्पूर्ण हिन्दू समाज के आप सभी को सपरिवार, युगदर्पण परिवार की ओर से दीपावली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं। 
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है -इस देश को लुटने से बचाने तथा बिकाऊ मेकालेवादी, मीडिया का एक मात्र सार्थक, व्यापक, विकल्प -राष्ट्र वादी मीडिया |अँधेरे के साम्राज्य से बाहर का एक मार्ग...remain connected to -युगदर्पण मीडिया समूह YDMS. तिलक रेलन 9911111611 ... yugdarpan.com

दशहरा यदि सत्य का असत्य पर विजय का प्रतीक है, तो दीपावली प्रकाश का अन्धकार पर। आइयें, इस के लिये संकल्प लें: भ्रम के जाल को तोड़, अज्ञान के अंधकार को मिटा कर, ज्ञान का प्रकाश फेलाएं। आइये, शर्मनिरपेक्ष मैकालेवादी बिकाऊ मीडिया द्वारा समाज को भटकने से रोकें; जागते रहो, जगाते रहो।।
यह दीपावली भारतीय जीवन से आतंकवाद, अवसरवाद, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की अमावस में, सत्य का दीपक जला कर धर्म व सत्य का प्रकाश फैलाये तथा भारत को सोने की चिड़िया का खोया वैभव, पुन:प्राप्त हो! अखिल विश्व में फैले सम्पूर्ण हिन्दू समाज के आप सभी को सपरिवार, युगदर्पण परिवार की ओर से दीपावली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं।
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है -इस देश को लुटने से बचाने तथा बिकाऊ मेकालेवादी, मीडिया का एक मात्र सार्थक, व्यापक, विकल्प -राष्ट्र वादी मीडिया |अँधेरे के साम्राज्य से बाहर का एक मार्ग...remain connected to -युगदर्पण मीडिया समूह YDMS. तिलक रेलन 9911111611 ... yugdarpan.com

Wednesday, 5 September 2012

मैं भारत हूँ!!

मैं भारत हूँ!! (हमारी प्रकृति व नियति)
रोक न पाए, जिसको ये विश्व सारा,
वो एक बूँद, आँख का पानी हूँ मैं,
यदि रख सको, तो अमिट निशानी हूँ मैं,
न संभाल सको, तो बस एक कहानी हूँ मैं,
उन शर्मनिर्पेक्षों से पूछो, क्या हमको सिखाते?
तुम्हें छोड़ सब जानते, क्या है संस्कृति हमारी;
वसुधैव कुटुम्बकम की प्रकृति है हमारी,
विश्वगुरु फिर कहाने की नियति है हमारी,
समझो खुली किताब के जैसी कहानी हूँ मैं,
यदि रख सको, तो अमिट निशानी हूँ मैं,
न संभाल सको, तो बस एक कहानी हूँ मैं,
कितना भी गहरा घाव दे कोई हमको,
उतना ही मुस्करान भी आता है हमको,
अतिथियों का स्वागत किया है सदा ही,
शत्रुओं को मिटाना भी आता है हमको;
ये शब्द नहीं इतिहास की जुबानी हूँ मैं;
यदि रख सको, तो अमिट निशानी हूँ मैं,
न संभाल सको, तो बस एक कहानी हूँ मैं,
खोलना चाहते हो क्यों, बंद उस द्वार को?
द्वार मस्तिष्क खोलो, न रहो आंख मीचे,
वरना रह जायेगा, केवल पछताना पीछे,
धधकता है ज्वालामुखी, बड़ा जिसके पीछे,
राम का भक्त हनुमान जैसी रवानी हूँ मैं;
"यदि रख सको, तो अमिट निशानी हूँ मैं,
न संभाल सको, तो बस एक कहानी हूँ मैं".

देश केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं !
देश की मिटटी की सुगंध, भारतचौपाल!
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है-युगदर्पण

Wednesday, 16 May 2012


17, मई 2012 आज 17 वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धा सुमन 
माँ, जो गर्भ से मृत्यु तक, हर पल अपने बच्चों के हर दुःख सुख की साथी, जिसकी गोद हर पीड़ा का हरण करती है। बचपन ही नहीं वृद्धावस्था व् जीवन के अंत तक हर पल जब भी तुझे स्मरण करता हूँ भाव विहल हो जाता हूँ। माँ, तेरी याद बहुत आती है, ....माँ, तेरी याद बहुत आती है।
माँ, इन 2 वर्षों में दामाद और बहु भी हो गए हैं शीघ्र ही अगली पीडी भी हो जाएगी। दामाद- सिद्धार्थ है, तथा बहू शालिमा है। तिलक- संपादक युग दर्पण मीडिया समूह, 9911111611, 9654675533.

Sunday, 22 April 2012

बहुत सी रचनायें  हमने मंच पर साँझा की, जो हमारे समाज पर आधारित थी . हमने जयादातर रचनाओं में महिला की दशा का वर्णन किया  ...उस पर होते अत्याचार पर चर्चा की. वे हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं..ठीक वैसे ही जैसे की पुरुष है . आज उसी पुरुष के नजरिये  एक  रचना आप सभी सुधि जनों को समर्पित करता हूँ...आप का समर्थन चाहूँगा  :-

किसी ने नहीं देखा है कभी
मर्द का चिल्लाता हुआ दर्द
वह  सहमा सा ही रहता है
एक पूँछ लगे हुए कुत्ते सा
अपनी ही  टाँगों के बीच में
हर एक उसका रिश्ता यहाँ
करता है उसपे तीखा वार
बनकर जैसे तेज़ धार तलवार 


वह अक्सर बहुत सहता है
और सहमता है वह खुद ही
होने पे अपने मर्द का दर्जा
बनता है  रोज़ ही शिकार
वह कभी बहन के हक से
वह कभी माँ के प्यार से
कोरे अधिकार से पत्नी के 
कभी बच्चों के ख्वाव से


रहता है  निरीह जानवर सा
वह सदा स्नेह का भिक्षुक 
जीता एक अनचाही जिंदगी
अकेला वह होते हुए शिकार
अक्सर ही तन और मन पे
वह झेलता है रोज़ कितने बाण
फिर भी कहते हैं लोग यही
मर्द को दर्द होता  ही नहीं

अक्सर मंचों से मैं सुनता हूँ
महिला होने के अभिशाप का प्रलाप  
जो मारता दबाता है पुरुष को
जो ठहराता है दबंग और दानव
जबकि सच तो ये भी है कि
परुष पग पग छला जाता है
पुरुष ही नहीं बनाता शिकार
उसका भी शिकार किया जाता है


केदारनाथ "कादर"